भारतीय सिनेमा लगातार ग्लोबल होता जा रहा है और दर्शक सभी भाषाओं की फिल्में देख रहे हैं। South India में तो फिल्में एक तरह से जीवन का हिस्सा होती हैं और दर्शक फिल्मी सितारों को भगवान की तरह पूजते हैं। South की चारों भाषाओं की फिल्म जमकर पैसा कमाती हैं लेकिन पहले के मुकाबले अब हिंदी यानि बॉलीबुड की फिल्मों की भी यहां डिमांड बढ़ने लगी है।

इसका सबसे बड़ा कारण है South Cinema का पैन इंडिया यानि देश के हर हिस्से में सिनेमाघरों में जा कर देखा जाना। जब से हिंदी बेल्ट ने साउथ की फिल्मों को सिर-आंखों पर रखना शुरू किया है साउथ वाले भी बॉलीवुड सिनेमा के प्रति ज्यादा क्रेजी होने लगे हैं।
बाहुबली, आरआरआर, पुष्पा और केजीएफ जैसी दक्षिण फिल्मों के उत्तर भारतीय बेल्ट में असाधारण प्रदर्शन करने के बाद, अब हिंदी फिल्में दक्षिण में भारी कमाई कर रही हैं। शाहरुख खान की जवान ने साउथ में शानदार बिजनेस किया है और अब रणबीर कपूर की एनिमल भी दक्षिण भारतीय राज्यों कमाई की सुनामी ला रही है। ध्यान से देखे तों जवान में साउथ कनेक्शन नयनतारा और निर्देशक एटली के रूप में था तो एनिमल में रश्मिका मंदाना और निर्देशक संदीप रेड्डी वंगा के रूप में।
ये दोनों फिल्में एपी और तेलंगाना में केवल तीन दिनों में ब्रेक ईवन के आंकड़े तक पहुंच गई। आने वाले बॉलीवुड दिग्गजों की जबरदस्त डिमांड है। शाहरुख की डंकी 21 दिसंबर को रिलीज हो रही है और फिल्म को South India के राज्यों में व्यापक रिलीज मिलेगी। राजकुमारी हिरानी निर्देशित इस फिल्म की टक्कर प्रभास की सालार-पार्ट 1 सीजफायर से होगी। ऋतिक रोशन की फाइटर भी सबसे बहुप्रतीक्षित फिल्म है और निर्माता दक्षिण भारतीय अधिकारों के लिए बड़ी बोली लगा रहे हैं। इस फिल्म में सिद्धार्थ आनंद निर्देशक हैं और दीपिका पादुकोण और अनिल कपूर भी दिखेंगे। अगर डंकी और फाइटर अच्छा प्रदर्शन करते हैं, तो आने वाले दिनों में बॉलीवुड वालों की South India में चांदी होने वाली है।
तमिल फिल्म इंडस्ट्री सबसे बड़ी है। साल 2022 में भारतीय फिल्म उद्योग का रेवेन्यू ₹15,000 करोड़ आंका गया है। South India बाजार में, तमिल का रेवेन्यू ₹2,950 करोड़ के साथ सूची में शीर्ष पर है, इसके बाद तेलुगु (₹2,500 करोड़), कन्नड़ (₹1,570 करोड़), और मलयालम (₹816 करोड़) का स्थान है।
क्षेत्रीय फिल्मों की सफलता का कारण क्षेत्रीय फिल्मों का स्वयं अपनी क्षमता को पहचानना और अपने मूल्य पर बड़ा दांव लगाना है। अतीत में, रिजनल कंटेंट की कहानियों और फिल्मों ने बड़े पैमाने पर बेहतर प्रोडक्शन वैल्यू के साथ बॉलीवुड में रीमेक को प्रेरित किया।
साउथ सिनेमा से क्यों पिछड़ रहा है बॉलीवुड
बॉक्स-ऑफिस कलेक्शन के मामले में बॉलीवुड के बार-बार दक्षिण सिनेमा से पिछड़ने का कारण खराब कंटेंट, सिंगल-स्क्रीन थिएटरों में गिरावट, हिंदी फिल्मों पर मनोरंजन कर, डेमोग्राफी में अंतर और डिजिटल स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म का बढ़ना है। हालांकि इस पठान, जवान और एनिमल जैसी तूफानी कमाई ने इस अंतर को कुछ कम किया है।
हां, यह एक तथ्य है, हालांकि यह एक चेतावनी के साथ आता है। भारत की 2022 की ब्रेकआउट फिल्में निश्चित रूप से दक्षिण की थीं। ब्लॉकबस्टर केजीएफ चैप्टर 2 (कन्नड़ से) और आरआरआर (तेलुगु से) दोनों ने दुनिया भर में 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की और 2022 की टॉप ग्लोबल 50 फिल्मों में शामिल हुईं।
वैसे तो बॉलीवुड और साउथ की फिल्में कई मामलों में बराबर हैं लेकिन कुछ ऐसा कारण हैं जिनकी वजह से कमाई और लोकप्रियता के मामले में इनका बोलबाला ज्यादा है। और वो कारण हैं-
जबरदस्त टेक्नालॉजी
तकनीकी विकास के मामले में दक्षिण भारत हमेशा बाकी देश से आगे रहा है। सिनेमा भी इसका अपवाद नहीं है. दृश्य प्रभावों, मोशन कैप्चर और अन्य उन्नत तकनीकों का उपयोग दक्षिण भारतीय फिल्मों में तेजी से प्रचलित हुआ है। "बाहुबली" एक प्रमुख उदाहरण है। दक्षिण भारतीय फिल्मों ने वर्चुअल रियालिटी और 360-डिग्री फिल्म निर्माण के साथ प्रयोग करना शुरू कर दिया है, जो दर्शकों के लिए फिल्म अनुभव का एक नया स्तर प्रदान करता है।
कैरेक्टर गढ़ना
दक्षिण भारतीय फिल्मों में अक्सर अधिक जटिल और अच्छी तरह से विकसित कैरेक्टर होते हैं, जो दर्शकों को उनकी कहानियों में अधिक जोड लेते हैं। फिल्म "कंतारा" में, चरित्र को सर्वोच्च शक्ति का आशीर्वाद मिलने के बावजूद, गांव का हर लड़का खुद से जुड़ने में सक्षम होता। यही बात फिल्म "पुष्पा" के लिए भी है, जहां हर दिहाड़ी मजदूर ने स्क्रीन पर अपना एक वीर रूप देखा।
सामाजिक संदेश
दक्षिण भारतीय फिल्में अपनी सामाजिक संदेश और समसामयिक मुद्दों को संबोधित करने के लिए जानी जाती हैं। साउथ सिनेमा सामाजिक बुराइयों पर केंद्र के माध्यम से प्रहार करता है। दक्षिण भारतीय फिल्में केवल आकर्षक गाने, रोमांचक एक्शन या आकर्षक कथानक के बारे में नहीं हैं, बल्कि यह जातिवाद, भ्रष्टाचार और मानव शोषण जैसे सामाजिक मुद्दों को उजागर करने की जिम्मेदारी भी लेती हैं। सूर्या की फिल्म "जय भीम" इसका बड़ा उदाहरण है जिसने पुलिस भ्रष्टाचार, अमानवीय हिरासत यातना और जातिवाद की अभी भी प्रचलित सामाजिक बुराई को उजागर किया है।
मजबूत कास्ट
दक्षिण भारतीय फिल्मों में दमदार कास्टिंग होती है। न केवल लीड एक्टर बल्कि सभी सहायक पात्रों के साथ-साथ विलेन भी सिनेमा को आगे बढ़ाने में समान जिम्मेदारी लेते हैं। दूसरी ओर, बॉलीवुड में फोकस सिर्फ एक ब्लॉकबस्टर हीरो को कास्ट करने पर होता है और पूरी कहानी उसके इर्द-गिर्द घूमती है। मजबूत कलाकारों का एक उत्कृष्ट उदाहरण फिल्म "बाहुबली" है, जहां न केवल प्रभास का किरदार सुर्खियों में था, बल्कि राजमाता, भल्लालदेव, देवसेना और सबसे प्रिय कटप्पा के किरदार को अच्छी तरह से लिखा गया था। और तो और प्रभाकर द्वारा निभाया गया कालकेय राजा का किरदार और उसके डॉयलाग भी आज भी सभी की यादों में हैं।
सांस्कृतिक रूप से समृद्ध सेट
एक तरफ बॉलीवुड शूटिंग के लिए सबसे विदेशी विदेशी स्थानों पर उड़ान भरने में व्यस्त है, जिसमें कई बार तो कहानी का उससे कोई मतलब भी नहीं होता तो साउथ की फिल्में अपने लाभ के लिए दक्षिणी शहरों के मूल सुंदर और मंत्रमुग्ध कर देने वाली जगहों का उपयोग कर रही हैं। दक्षिण के शहर ऐतिहासिक मंदिरों, लुभावनी वास्तुकला और सुंदर परिदृश्य के लिए प्रसिद्ध हैं जो साउथ सिनेमा की जान हैं। फिल्म "पुष्पा" में शेषचलम पहाड़ियों के सीन और आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के मंत्रमुग्ध कर देने वाले सीन्स ने कहानी में जान डाल दी।

इसका सबसे बड़ा कारण है South Cinema का पैन इंडिया यानि देश के हर हिस्से में सिनेमाघरों में जा कर देखा जाना। जब से हिंदी बेल्ट ने साउथ की फिल्मों को सिर-आंखों पर रखना शुरू किया है साउथ वाले भी बॉलीवुड सिनेमा के प्रति ज्यादा क्रेजी होने लगे हैं।
बाहुबली, आरआरआर, पुष्पा और केजीएफ जैसी दक्षिण फिल्मों के उत्तर भारतीय बेल्ट में असाधारण प्रदर्शन करने के बाद, अब हिंदी फिल्में दक्षिण में भारी कमाई कर रही हैं। शाहरुख खान की जवान ने साउथ में शानदार बिजनेस किया है और अब रणबीर कपूर की एनिमल भी दक्षिण भारतीय राज्यों कमाई की सुनामी ला रही है। ध्यान से देखे तों जवान में साउथ कनेक्शन नयनतारा और निर्देशक एटली के रूप में था तो एनिमल में रश्मिका मंदाना और निर्देशक संदीप रेड्डी वंगा के रूप में।
ये दोनों फिल्में एपी और तेलंगाना में केवल तीन दिनों में ब्रेक ईवन के आंकड़े तक पहुंच गई। आने वाले बॉलीवुड दिग्गजों की जबरदस्त डिमांड है। शाहरुख की डंकी 21 दिसंबर को रिलीज हो रही है और फिल्म को South India के राज्यों में व्यापक रिलीज मिलेगी। राजकुमारी हिरानी निर्देशित इस फिल्म की टक्कर प्रभास की सालार-पार्ट 1 सीजफायर से होगी। ऋतिक रोशन की फाइटर भी सबसे बहुप्रतीक्षित फिल्म है और निर्माता दक्षिण भारतीय अधिकारों के लिए बड़ी बोली लगा रहे हैं। इस फिल्म में सिद्धार्थ आनंद निर्देशक हैं और दीपिका पादुकोण और अनिल कपूर भी दिखेंगे। अगर डंकी और फाइटर अच्छा प्रदर्शन करते हैं, तो आने वाले दिनों में बॉलीवुड वालों की South India में चांदी होने वाली है।
दक्षिण भारत में नंबर 1 फिल्म इंडस्ट्री कौन सी है?
तमिल फिल्म इंडस्ट्री सबसे बड़ी है। साल 2022 में भारतीय फिल्म उद्योग का रेवेन्यू ₹15,000 करोड़ आंका गया है। South India बाजार में, तमिल का रेवेन्यू ₹2,950 करोड़ के साथ सूची में शीर्ष पर है, इसके बाद तेलुगु (₹2,500 करोड़), कन्नड़ (₹1,570 करोड़), और मलयालम (₹816 करोड़) का स्थान है।
दक्षिण भारतीय फिल्में इतना अच्छा प्रदर्शन क्यों कर रही हैं?
क्षेत्रीय फिल्मों की सफलता का कारण क्षेत्रीय फिल्मों का स्वयं अपनी क्षमता को पहचानना और अपने मूल्य पर बड़ा दांव लगाना है। अतीत में, रिजनल कंटेंट की कहानियों और फिल्मों ने बड़े पैमाने पर बेहतर प्रोडक्शन वैल्यू के साथ बॉलीवुड में रीमेक को प्रेरित किया।
क्या साउथ से हार रहा है बॉलीवुड?
साउथ सिनेमा से क्यों पिछड़ रहा है बॉलीवुड
बॉक्स-ऑफिस कलेक्शन के मामले में बॉलीवुड के बार-बार दक्षिण सिनेमा से पिछड़ने का कारण खराब कंटेंट, सिंगल-स्क्रीन थिएटरों में गिरावट, हिंदी फिल्मों पर मनोरंजन कर, डेमोग्राफी में अंतर और डिजिटल स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म का बढ़ना है। हालांकि इस पठान, जवान और एनिमल जैसी तूफानी कमाई ने इस अंतर को कुछ कम किया है।
क्या दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग बॉलीवुड से बेहतर है?
हां, यह एक तथ्य है, हालांकि यह एक चेतावनी के साथ आता है। भारत की 2022 की ब्रेकआउट फिल्में निश्चित रूप से दक्षिण की थीं। ब्लॉकबस्टर केजीएफ चैप्टर 2 (कन्नड़ से) और आरआरआर (तेलुगु से) दोनों ने दुनिया भर में 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की और 2022 की टॉप ग्लोबल 50 फिल्मों में शामिल हुईं।
साउथ की फिल्मों के ज्यादा बेहतर होने के कारण
वैसे तो बॉलीवुड और साउथ की फिल्में कई मामलों में बराबर हैं लेकिन कुछ ऐसा कारण हैं जिनकी वजह से कमाई और लोकप्रियता के मामले में इनका बोलबाला ज्यादा है। और वो कारण हैं-
जबरदस्त टेक्नालॉजी
तकनीकी विकास के मामले में दक्षिण भारत हमेशा बाकी देश से आगे रहा है। सिनेमा भी इसका अपवाद नहीं है. दृश्य प्रभावों, मोशन कैप्चर और अन्य उन्नत तकनीकों का उपयोग दक्षिण भारतीय फिल्मों में तेजी से प्रचलित हुआ है। "बाहुबली" एक प्रमुख उदाहरण है। दक्षिण भारतीय फिल्मों ने वर्चुअल रियालिटी और 360-डिग्री फिल्म निर्माण के साथ प्रयोग करना शुरू कर दिया है, जो दर्शकों के लिए फिल्म अनुभव का एक नया स्तर प्रदान करता है।
कैरेक्टर गढ़ना
दक्षिण भारतीय फिल्मों में अक्सर अधिक जटिल और अच्छी तरह से विकसित कैरेक्टर होते हैं, जो दर्शकों को उनकी कहानियों में अधिक जोड लेते हैं। फिल्म "कंतारा" में, चरित्र को सर्वोच्च शक्ति का आशीर्वाद मिलने के बावजूद, गांव का हर लड़का खुद से जुड़ने में सक्षम होता। यही बात फिल्म "पुष्पा" के लिए भी है, जहां हर दिहाड़ी मजदूर ने स्क्रीन पर अपना एक वीर रूप देखा।
सामाजिक संदेश
दक्षिण भारतीय फिल्में अपनी सामाजिक संदेश और समसामयिक मुद्दों को संबोधित करने के लिए जानी जाती हैं। साउथ सिनेमा सामाजिक बुराइयों पर केंद्र के माध्यम से प्रहार करता है। दक्षिण भारतीय फिल्में केवल आकर्षक गाने, रोमांचक एक्शन या आकर्षक कथानक के बारे में नहीं हैं, बल्कि यह जातिवाद, भ्रष्टाचार और मानव शोषण जैसे सामाजिक मुद्दों को उजागर करने की जिम्मेदारी भी लेती हैं। सूर्या की फिल्म "जय भीम" इसका बड़ा उदाहरण है जिसने पुलिस भ्रष्टाचार, अमानवीय हिरासत यातना और जातिवाद की अभी भी प्रचलित सामाजिक बुराई को उजागर किया है।
मजबूत कास्ट
दक्षिण भारतीय फिल्मों में दमदार कास्टिंग होती है। न केवल लीड एक्टर बल्कि सभी सहायक पात्रों के साथ-साथ विलेन भी सिनेमा को आगे बढ़ाने में समान जिम्मेदारी लेते हैं। दूसरी ओर, बॉलीवुड में फोकस सिर्फ एक ब्लॉकबस्टर हीरो को कास्ट करने पर होता है और पूरी कहानी उसके इर्द-गिर्द घूमती है। मजबूत कलाकारों का एक उत्कृष्ट उदाहरण फिल्म "बाहुबली" है, जहां न केवल प्रभास का किरदार सुर्खियों में था, बल्कि राजमाता, भल्लालदेव, देवसेना और सबसे प्रिय कटप्पा के किरदार को अच्छी तरह से लिखा गया था। और तो और प्रभाकर द्वारा निभाया गया कालकेय राजा का किरदार और उसके डॉयलाग भी आज भी सभी की यादों में हैं।
सांस्कृतिक रूप से समृद्ध सेट
एक तरफ बॉलीवुड शूटिंग के लिए सबसे विदेशी विदेशी स्थानों पर उड़ान भरने में व्यस्त है, जिसमें कई बार तो कहानी का उससे कोई मतलब भी नहीं होता तो साउथ की फिल्में अपने लाभ के लिए दक्षिणी शहरों के मूल सुंदर और मंत्रमुग्ध कर देने वाली जगहों का उपयोग कर रही हैं। दक्षिण के शहर ऐतिहासिक मंदिरों, लुभावनी वास्तुकला और सुंदर परिदृश्य के लिए प्रसिद्ध हैं जो साउथ सिनेमा की जान हैं। फिल्म "पुष्पा" में शेषचलम पहाड़ियों के सीन और आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के मंत्रमुग्ध कर देने वाले सीन्स ने कहानी में जान डाल दी।

